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Showing posts from November, 2017
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चम्बल का संसद : इंकतेश्वर महादेव      ऐसा नहीं कि शिल्प केवल बुलंद इमारतों एवं अट्टालिकाओं में ही दिखे। चम्बल को भले ही बीहड़ों की भयावहता एवं दुर्यान्त डकैतों की आश्रय स्थली के तौर पर देखा जाता हो लेकिन कलाशिल्प-वास्तुशिल्प में भी पीछे नहीं।   मध्यकालीन शिल्पियों एवं वास्तुविद-वास्तु शिल्पकारों ने 'अंदाज-ए-बयां" कुछ ऐसा अंजाम दिया, जो देश-दुनिया का एक नायाब तोहफा बन गया। मध्यकालीन शिल्पकारों ने चम्बल की एक विशाल चट्टान को इच्छाशक्ति से विशिष्ट बना दिया। ब्रिाटिश आर्कीटेक्ट सर हरबर्ट बेकर भी स्थापत्य कला एवं संरचना को देख अभिभूत हो गए थे।     जी हां, इस स्थान को खास तौर से 'चम्बल का संसद" की संज्ञा दी गयी है। 'चम्बल का संसद" कहा भी क्यूं न जाए ? क्योंकि भारतीय संसद का आकार-प्रकार-ढ़ांचा सभी कुछ इस भव्य-दिव्य देवालय पर आधारित है। मध्य प्रदेश के चम्बल मुरैना में मितावली पर स्थित है। इकोत्तरसो या इंकतेश्वर महादेव के नाम से ख्याति प्राप्त यह 'देवालय" भूमि तल से करीब तीन सौ फीट ऊंचाई पर स्थित है।       विशेषज्ञों की मानें तो 'भारत...
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हाइपेरियन : दुनिया का सबसे ऊंचा पेड़      दुनिया-धरती में 'अजूबा" की कहीं कोई कमी नहीं। 'सौन्दर्य-लालित्य एवं माधुर्य" से लबरेज 'अजूबा" धरती में कहां नहीं ? वन एवं पर्यावरण श्रंखला में भी 'सौन्दर्य-लालित्य एवं माधुर्य" कम नहीं।     इस प्राकृतिक सम्पदा को सुरक्षित-संरक्षित रखना भौतिकतावादी युग में भले ही कुछ मुश्किल भले ही हो गया हो लेकिन प्राकृतिक सम्पदा श्रंखला का दुनिया धरती में अपार भण्डार है। इन प्राकृतिक सम्पदाओं में विलक्षणता भी विद्यमान है।        विशेषज्ञों की मानें तो न्यूयार्क का 'स्टैच्यू आफ लिबर्टी" अपनी शीर्षता के लिए दुनिया में ख्याति रखता है लेकिन दुनिया की वन एवं पर्यावरण सम्पदा श्रंखला 'स्टैच्यू आफ लिबर्टी" को चुनौती देती है। कैलिफोर्निया का 'हाइपेरियन" वृक्ष-पेड़ अपनी ऊंचाई के लिए ख्याति रखता है।     विशेषज्ञों की मानें तो 'हाइपेरियन" वृक्ष धरती का सबसे अधिक ऊंचाई वाला पेड है। इसे कैलिफोनिया में रेडवुड अर्थात लाल लकड़ी की संज्ञा से नवाजा गया है। इन विलक्षण पेड़ों की आैसत आयु भी आश्चर्...
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कंबोडिया का टा प्रोहोम : नैराश्य में सौन्दर्य      'नैराश्य में सौन्दर्य" जी हां, सामान्यत: खण्डर नैराश्य का प्रतीक होते हैं लेकिन ऐसा भी नहीं कि खण्डर में सौन्दर्य न दिखे। बस सलीके से सजाने-संवारने की आवश्यकता होगी।      कंबोडिया का 'राजा विहार" मंदिर अपने शिल्प एवं वैशिष्ट्य के कारण विश्व विख्यात हो रहा। हालांकि 'राजा विहार" मंदिर खण्डर की भांति विद्यमान है लेकिन खण्डहर का सौन्दर्य भी दर्शकों-श्रद्धालुओं एवं पर्यटकों को आकर्षित करता है।      कंबोडिया के इस विलक्षण मंदिर को 'टा प्रोहोम" के नाम से देश-दुनिया में खास तौर से जाना-पहचाना जाता है। कंबोडिया में 'टा प्रोहोम" का आशय 'पूर्वज ब्राह्मा" होता है। कंबोडिया के सिम रीप प्रांत के अंगकोर में स्थित है।     खण्डहर में सामान्यत: नैराश्य प्रतीत होता है लेकिन 'टा प्रोहोम" में ऐसा नहीं है क्योंकि यहां 'नैराश्य में सौन्दर्य एवं लालित्य" का बोध होता है। कंबोडिया का यह मंदिर 12 वीं एवं 13 वीं शताब्दी के मध्य बना। कंबोडिया की बैन शैली पर आधारित यह विलक्षण मं...
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कापूचिन कैटाकोम्ब : आश्चर्यजनक किन्तु सत्य     'आश्चर्यजनक किन्तु सत्य" जी हां, कब्रिास्तान तो देखे सुने जाते हैं लेकिन शव संग्रहालय बहुत कम ही सुना जाना गया।   इटली में दुनिया का सबसे अजूबा संग्रहालय है। हालांकि संग्रहालय संवेदनशील एवं कमजोर ह्मदय वाले व्यक्तियों को अवलोकन की इजाजत नहीं देता। इस आश्चर्यजनक संग्रहालय को देश-दुनिया में 'कापूचिन कैटाकोम्ब" के नाम से जाना-पहचाना जाता है।    इसे अनोखा कब्रिास्तान कहा जाये या शव संग्रहालय की संज्ञा दी जाये। विशेषज्ञों की मानें तो सदियों पुराने इस शव संग्रहालय में करीब दस हजार शव संग्रहित हैं। यह एक ऐसा शव संग्रहालय है, जहां शव को ममी बना कर सुरक्षित रखा गया है।      इटली के शहर सिसली में स्थित इस शव संग्रहालय को देखने देश दुनिया के असंख्य पर्यटक आते हैं। 'कापूचिन कैटाकोम्ब" शायद दुनिया को विलक्षण एवं अनोखा शव संग्रहालय है। 'कैटाकोम्ब" का शाब्दिक अर्थ अण्डर ग्राउण्ड कब्रिास्तान होता है।       विशेषज्ञ बताते हैं कि प्राचीन रोम में इस तरह के कब्रिास्तान बहुतायत में पाये...
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माउंट रुश्मोरे : विशिष्ट एवं शिल्प सौन्दर्य      भले ही कलाकृतियां बहुत अधिक पुरानी-प्राचीन न हों लेकिन अपनी विशिष्टता से एक अलग पहचान बना ही लेती हैं।     जी हां, युनाईटेड स्टेट्स का 'माउंट रुश्मोरे" भले ही अत्यधिक प्राचीन न हो लेकिन दुनिया का एक आकर्षण है। हालात यह हैं कि देश-दुनिया की कलाकृतियों का उल्लेख हो आैर अमेरिका के 'माउंट रुश्मोरे" का उल्लेख न हो तो कहीं न कहीं कुछ अधूरा सा लगता है।      माउंट रुश्मोरे कलाकृति अत्यधिक पुरानी तो नहीं लेकिन विशिष्टता पहचान बन गयी। माउंट रुश्मोरे का निर्माण करीब डेढ दशक में पूर्ण हो सका।     इसके निर्माण में सौ-पचास नहीं बल्कि चार सौ से अधिक कुशल कारीगरों ने इसे तराशा-सजाया-संवारा। माउंट रुश्मोरे का निर्माण 4 अक्टूबर 1927 में प्रारम्भ हुआ। इसके निर्माण में करीब डेढ दशक लगे। निर्माण के प्रथम चरण में डाइनामाइट से दर्जनों को चट्टानों का हटाया-तोड़ा या ध्वस्त किया गया।    इसमें अमेरिका चार पूर्व राष्ट्रपतियों की छवियों को रुपांकित किया गया या उकेरा गया। इनमें ज...
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मान्यता-परम्परा : हवा में लटकते शव    'परम्पराओं एवं मान्यताओं" का कहीं कोई अंत नहीं। जी हां, देश-दुनिया में अजीब-ओ-गरीब मान्यतायें एवं परम्परायें देखने-सुनने को मिलती हैं।   अभी तक हैंगिंग टेम्पल, हैंगिंग फ्लाईओवर-ओवरब्रिाज, हैंगिंग रेस्ट्रां, हैंगिंग हाउस, हैंगिंग गार्डन आदि-अनादि सुुुना होगा लेकिन हैंगिंग कॉफिन नहीं सुना होगा लेकिन दुनिया में यह भी परम्परा है कि ताबुत (कॉफिन) को पहाड़ की चोटी पर लटकाया जाये।     आम तौर पर शव का अंतिम संस्कार करने से लेकर जमीन या कब्रिस्तान में दफन करने की व्यवस्थायें-परम्परायें देखते सुनते आये हैं लेकिन शव को ताबुुत में रख कर हवा में लटकाना नहीं सुना होगा।       दुनिया के कई देशों में समुदायों के बीच परम्परा है कि शव को ताबुत में रख कर पहाड़ पर लटका दिया जाये। बताते हैं कि दुनिया में यह परम्परा करीब दो हजार वर्ष पुरानी है। मान्यता है कि पहाड़ों पर शव रखने से मृत व्यक्ति का अस्तित्व आसानी से प्रकृति की आबोहवा में मिल जाता है।     हैंगिंग कॉफिन्स की परम्परा खास तौर से दुनिया के ती...
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ब्लू होल : मनोरंजकता में भी खतरा   'सौन्दर्य शास्त्र" का कथ्यात्मक तथ्यात्मक आलोक निश्चय ही किसी को भी लुभाने में समर्थ कहा जाएगा। प्राकृतिक सौन्दर्य जहां एक ओर मन-मस्तिष्क को प्रफुल्लित करता है तो वहीं इसमें खतरे भी कम नहीं। लाल सागर मिरुा तट पर प्राकृतिक सौन्दर्य का नायाब स्थल है।   इस स्थल को ब्लू होल के नाम से दुनिया में जाना-पहचाना जाता है। गोताखोर समुदाय का यह एक अति पसंदीदा स्थल है लेकिन ब्लू होल गोताखोरों के लिए बेहद खतरनाक भी माना जाता है।   देश दुनिया के तमाम पर्यटक इस स्थल पर गोतोखोरी देखने जाते हैं। इसे 'दुनिया के सबसे खतरनाक गोता स्थल" व 'गोताखोर के कब्रिास्तान" के तौर भी जाना जाता है।     करीब सौ मीटर गहराई वाले इस ब्लू होल में करीब तीस मीटर लम्बी सुरंग भी है। हालांकि इसका प्रवेश स्थल करीब छह मीटर चौडा़ई वाला है। सुरंग को कट्टर के रुप में जाना जाता है।      इस इलाके में मंूगा व चट्टानी मछली की उपलब्धता बहुतायत में है। मिरुा शासन ने इस स्थल पर खास तौर से गाइड्स व प्रशिक्षित कर्मचारी तैनात ...